Ultimate Relaxation
परम विश्रांति पाना हर जीव मात्र का जन्म सिध्द अधिकार है। क्षमा किजीए जन्म सिध्द नहीं अजन्म सिध्द आधिकार है। क्यो जीवन हो या न हो परम विश्रान्ति तो सदा है ही। जैसे सागर से उठा हुआ तरंग को सागर में पुनः लिऩ होना ही पडता है, वैसे ही परमात्मा रुपि सागर से उपजा हुआ यह तरंग नामक जीव परमात्मारुपि सागर में लिन होना अनिवार्य है। इस अनिवार्य शर्त को आज मानिए या कल मानो या न मानो तरंग तो सागर में ही है, सागर के पानि के बिना सागर की तरंगों का कोई अस्तित्व नही है। सारे तरंगें सागर के पानि में ही है और सागर कि पानिरुप है, वैसे ही समस्त विश्व उस परम पावन विश्वेश्वर में ही है और विश्वेश्वकारुप ही है। सागर और तरंग के उदाहरण में कुच गलति हो सकति है की सागर हर जगह नहीं है, और सर्वत्र एक जैसा भी नहीं हो सकता है, परंतु परमात्मा सर्वत्र है और सब ओर एक जैसा नहीँ अपितु एक ही है। जड, चेतनमय जीव जगत सकल राममय जानि।
आखिर मन में यह सवाल उठाता है की वह परम विश्रांति कैसे पाये ? विश्रान्ति पना नहीं है, जो पाया जाता है, वह समय पाकर खो भी जाता है। वह विश्रान्त तो सदा ही प्राप्त है, यहाँ बात समझना है की आखिर परम विश्रान्त किसे कहते है। इसिलिए गीता में भगवान श्री कृष्ण कहते है की - ज्ञानी महापुरुषों के पास जाकर नम्र विनंति करने से वे महापुरुष मन के व्दंद्व को अपनी वचन रुपि अमृत वर्षा सारे गुथियाँ खोल कर निर्मल आनंद का प्रसाद पान करातें हैं, जिस से जीव को अपनी भूलि हुई परम विश्रान्ति का अनुभव ऐसा हो ता है की जैसे किसी के गले में मोतियों की माला हो, वह दुनिया भर ढुंडता फिरता हो, जब कोई कहे अरे वह तो तेरे गले में ही है, वह तो तुझे सदैव ही प्राप्त था, वृथा भूल वश उसे कोई और जगह ढुंड रहा था। तब जैसा आश्चर्य होता है, उसे भी कई अधिक गुना आपको यह जान कर आश्चर्य होगा की वह परमात्मा कोई कहीँ आकाश पाताल में नहीं था, वह तो मेरा अपना आपा था, मुझे मालुम न था, और तुम्हारे हृदय से ऐसा गीत गुंजने लग जाएँगे की---
जीस खुदा को मैं ढुंड रहा था बरसों से,
कंबक्त वह मैं खुद था अनादी कालों से।
ढुंडता फिरता था मंदिर और मस्जिद में,
वह मैं खुद था मन की अंधियारों में।
नहीं जानता था अपनी वजुदि को,
मस्तक झुकाता था पथर और गोरी को।
अब न पथर बचा न गोरी बचि,
बचा एक मैं खुद सर्वत्र निहारु अपनी हस्ति को।
फिर भय, शोक, द्वेश, इर्षा या हर्ष, राग आदि का कहीं स्थान नहीं बचेगा। क्यों की जब कोई दुसरा दिखे पडेगा ही नहीं तो आप राग किससे करोगे, द्वेश किससे करोगे, राग या द्वेश दूसरे से ही होता है, अपने आपसे नहीं, विकार आदी भी दूसरे पर हीं आते अपने आप पे नहीं, इस लिए ज्ञानी महापुरुष विकार आदी से अलिप्त रहतें हैं, वे इस अदभूत दिव्य ज्ञान में हमेशा सजाग रहते है।
फिर भय, शोक, द्वेश, इर्षा या हर्ष, राग आदि का कहीं स्थान नहीं बचेगा। क्यों की जब कोई दुसरा दिखे पडेगा ही नहीं तो आप राग किससे करोगे, द्वेश किससे करोगे, राग या द्वेश दूसरे से ही होता है, अपने आपसे नहीं, विकार आदी भी दूसरे पर हीं आते अपने आप पे नहीं, इस लिए ज्ञानी महापुरुष विकार आदी से अलिप्त रहतें हैं, वे इस अदभूत दिव्य ज्ञान में हमेशा सजाग रहते है।
जिधर देखता हूँ, खुदा ही खुदा है।
खुदा से नहीं अब, कोई चिज जुदा है।
जब अवल और आखिर खुदा ही खुदा है।
तो अब भी वही है न उसके सिवा है।।
इसलिए ज्ञानी हमेशा निश्चींत रहता है, भविष्य की चिंता नहीं करता, भूत का शोक नहीं करता और वर्तमान को भी अपने आपे से भिन्न नही देखता, उसका नजर तो सोने पर है, उससे बने आभूषणो पे नहीं। सर्वत्र वो अपने को ही निहार कर अपने आप में सदा आनंदित रहता है। चाहे परिस्थिती अनूकूल हो या प्रतिकूल वह महापुरुष किसी में राग या द्वेश नहीं करता, सदैव आत्म द्रृष्टी रुपी समता के सिंहासन पर आरुढ रहता है। इसलिए आप ज्ञानी की कोई बाह्य व्यवहार को देख कर अंदाजा नहीं लगाया जा सकता है। ज्ञान तो अनूभव की बात है। इसलिए गुरु नानकजी ने सच ही कहा है -
ज्ञानि की गत ज्ञानी जाने।
और वह ज्ञानी आप भी बन सकते हो, जैसे ज्ञानी महापुरुष निश्चिंत जीवन जीते हैं, वैसे आप भी परम निश्चींत हो सकते हो क्य़ों की ज्ञानी तो शरीर से भीन्न है, मगर जो ज्ञानी का आपा है वही आपका भी है भीन्न नहीं। जैसे अग्नी की चिंगारि अग्नीरुप ही है। वैसे आप भी ब्रह्मरुप ही हो ब्रह्म का अंश नहीं। क्यों की ब्रह्म को छोड के दूसरा कोई है नहीं, जैसे सोने की गहनें चाहे कितने प्राकर की क्यो न हो मूल में तो सोना ही है, वैसे ही भीन्न-भीन्न प्रकार के दिखनेवाला यह सारा विश्व एक चैतन्य परमात्मा ही है कोई अन्य या अनजान नहीं, बस अब आगे वाणी का भी गति नहीं क्यो की अपने स्वरुप के आगे देश, काल, परिस्थिती, मन, बुध्दि या वाणी का कोई अस्तित्व ही नही है। यह सब अपने आपे के उपर चढाये गये उपाधियाँ है, कोई भिन्न वस्तु नहीं है, .........
एको ब्रह्म द्विति यो नस्ती, एको अहं द्वितियो ना अस्ती।।
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