Syboles of Indian culture


       ति लक
   हमारी संस्कृति में किसी भी पूजा, पाठ, यज्ञ, अनुष्ठान आदि का शुभारंभ श्रीगणेश पूजा से आरंभ होता है। उसी प्रकार बिना तिलक धारण किए कोई भी पूजा-प्रार्थना आरंभ नहीं होती। धर्म मान्यतानुसार सूने मस्तक को अशुभ और असुरक्षित माना जाता है। तिलक चंदन, रोली, कुंकुम, सिंदूर तथा भस्म का लगाया जाता है। तंत्रशास्त्र में तिलक की अनेक क्रिया-विधियां विभिन्न कार्यों की सफलता के लिए बताई गई हैं।
इन में से कुच का ही निम्न है –

*   कुम कुम धारण का मंत्र - 
                                                
                                                   कुमकुम कामनादिव्यं कामनाकामसंभवाम् ।
               कुम्कुमेनार्चितो देव गृहाण परमेश्वरः ।। 
*  श्रीगंध धारण का मंत्र –
                                                  
                               श्रीखण्डचंदनं दिव्यँ गन्धाढयं सुमनोहरम ।

                                विलेपनं सुरश्रेष्ठ चन्दन प्रतिगृह्यतां ।।
              
         *  लाल चंदन धारण का मंत्र –  
                                    
                               रक्त चन्दन समिश्रं पारिजातसम्दभवम् ।
                   
                               मया दत्तं गृहाणाश चन्दनं गन्धसंयुतम ।।

            *   सिंदूर धारण का मंत्र – 

                             सिन्दूरं शोभनं रक्तं सौभाग्यं सुखवर्धनम् ।

              शुभदं कामदं चैव सिन्दूर प्रतिगृह्यतां ।।



             *  भस्म धारण का मंत्र- 






 तिलक  का माहात्म –

                                   ललाट पर दोनों भौंहों के बीच विचारशक्ति का केंद्र है जिसे योगी लोग आज्ञाशक्ति का केंद्र कहते है। इसे शिवनेत्र अर्थात् कल्याणकारी विचारों का केंद्र भा कहते है। वहाँ पर चन्दन का तिलक या सिंदूर आदि का तिलक विचारशक्ति को, आज्ञाशक्ति को विकसित करता है। इसलिए हिन्दू धर्म में कोई भी शुभ कर्म करते समय ललाट पर तिलक किया जाता है। पूज्यपाद संत श्री आसारामजी बापू को चंदन का तिलक लगाकर सत्संग करते हुए लाखों-करोडों लोगों ने देखा है। ऋषियों ने भाव-प्रधान केंद्रों में रहनेवाली महिलाओं की समझदारी बढाने के उद्देश्य से तिलक की परंपरा शुरु की। अधिकांश महिलाओं का मन स्वाधिष्ठान और मणिपुर केन्द्र में रहता है। इन केन्द्रों में रहनेवाली महिलाओं की समझदारी बढाने के उद्देश्य से तिलक की परंपरा शुरु की। अधिकांश महिलाओं का मन स्वाधिष्ठान और मणिपुर केन्द्र में रहता है। इन केंद्रों में भय, भाव और कल्पनाओं की अधिकता रहती है। इन भावनाओं तथा कल्पनाओं में महिलाएँ बह न जायें, उनका शिवनेत्र, विचारशक्ति का केंद्र विकसित हो इस उद्देश्य से ऋषियों ने महिलाओं के लिए सतत तिलक करने की व्यवस्था की है। गार्गी, शाण्डिली, अनसूया, तथा और भी कई महान नारियाँ इस हिन्दू धर्म में प्रकट हुई। महान वीरों को, महान पुरुषों को, महान विचारकों को तथा परमात्मा का दर्शन करवाने का सामर्थ्य रखनेवाले संतों को जन्म देनेवाली मातृशक्ति को आज हिन्दूस्तान के कुछ स्कूलों में तिलक करने पर टोका जाता है। इस प्रकार के जुल्म हिन्दूस्तानी कब तक सहते रहेंगे ? इस प्रकार के षड्यंत्रों के शिकार हिन्दूस्तानी कब तक बनते रहेंगे ?



ज्योतिष शास्त्र के अनुसार तिलक का महत्व
ज्योतिषशास्त्र के अनुसार कालपुरूष की गणना प्रथम राशि मेष से की गई है। महर्षि पराशर के सिद्धांत के अनुसार कालपुरूष के मस्तक वाले स्थान में मेष राशि स्थित है। जिसका स्वामी मंगल ग्रह सिंदूरी लाल रंग का अधिष्ठाता है। सिंदूरी लाल रंग राशि पथ की मेष राशि का ही रंग है। इसीलिए इस रंग (लाल रोली या सिंदूर) का तिलक मेष राशि वाले स्थान (मस्तक) पर लगाया जाता है। तिलक लगाने में सहायक हाथ की अंगुलियों का भी भिन्न-भिन्न महत्व बताया है।

* तिलक धारण करने में अनामिका अंगुली शांति प्रदान करती है।    


           * मघ्यमा अंगुली मनुष्य की आयु वृद्धि करती है ।


*     अंगूठा प्रभाव और ख्याति तथा आरोग्य प्रदान कराता है। इसीलिए राजतिलक अथवा विजय तिलक अंगूठे से ही करने की परंपरा रही है।

*     तर्जनी मोक्ष देने वाली अंगुली है।

 सामुद्रिकशास्त्र के अनुसार भी अनामिका तथा अंगूठा तिलक करने में सदा शुभ माने गए हैं। अनामिका सूर्य पर्वत की अधिष्ठाता अंगुली है। यह अंगुली सूर्य का प्रतिनिधित्व करती है, जिसका तात्पर्य यही है कि सूर्य के समान, दृढ़ता, तेजस्व, प्रभाव, सम्मान, सूर्य जैसी निष्ठा-प्रतिष्ठा बनी रहे। दूसरा अंगूठा है जो हाथ में शुक्र क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करता है। शुक्र ग्रह जीवन शक्ति का प्रतीक है। संजीवनी विद्या का प्रणेता तथा जीवन में सौम्यता, सुख-साधन तथा काम-शक्ति देने वाला शुक्र ही संसार का रचयिता है।


"तिलक" का विज्ञान एवं दर्शन
            हिंदू परंपरा में मस्तक पर तिलक या टिका लगाना धार्मिक कृत्यों के साथ जुड़ा हुआ है। प्रत्येक शुभ अवसर पर ऐसा करना प्रसन्नता का, सात्विकता का, सफलता का चिन्ह माना जाता है। किसी महत्वपूर्ण कार्य या विजय अभियान में निकलने पर रोली, हल्दी, चंदन या कुंकुम का तिलक लगाया जाता है। तीर्थो में देवदर्शन हेतु उपस्थित होने पर वहाँ माथे पर तिलक लगाकर शुभकामना दी जाती है। भारतीय संस्कृति में कर्मकाड़ों , परंपराओं, प्रथाओं को विनिर्मित करने वाले हमारे प्राचिन ऋषि एक साथ वैज्ञानिक भी थे और महान् दार्शनिक भी थे। इसलिए किसी भी शुभ प्रचलन की स्थापना में उन्होनें इन दोंनो दृष्टियों को ध्यान में रखा, ताकि कोई एक पक्ष सर्वथा उपेक्षित न पड़ा रहे एवं दूसरे के दुरुपयोग की संभावना न बढ़ जाये। इसके पीछे संतुलन-समीकरण का प्रायोजन ही प्रमुख था, जिससे दोनों वर्ग के अनुयायी संतुष्ट हो सकें और स्थापना को समान महत्व दे सकें। सर्वप्रथम इसके विज्ञान पक्ष को लेंगे। ललाट में टिका या तिलक जिस स्थान पर लगाया जाता है, वह भ्रू-मध्य या आज्ञाचक्र है। शरीरशास्त्र की दृष्टि से यह स्थान पीनियल ग्रंथि का है। प्रयोगो द्वारा यह सिद्ध हो चुका है कि प्रकाश से गहरा संबंध हे।     

                                                               
प्रयोगो में जब किसी व्यक्ति की आँखो में पट्टी बाँधकर सिर को पूरी तरह से ढक दिया गया और उसकी पीनियल ग्रंथि को उद्ददीप्त किया गया , तो उसे मस्तक के अंदर प्रकाश की अनुभुति हुई। यह इस बात को प्रमाणित करता है कि ध्यान- धारणा के माध्यम से साधक में जो प्रकाश का अवतरण आज्ञाचक्र में होता है, उसका कोई न कोई संबंध इस स्थूल अवयव से अवश्य है। ऋषियों को यह तथ्य भलीभाति पता था, इसलिए उन्होनें टीका लगाने के प्रचलन को पूजा उपासना के साथ-साथ हर शुभ कार्य से जोड़कर उसे धार्मिक कर्मकाड़ का एक अविच्छिन अंग बना दिया। यह एक वैज्ञानिक तथ्य है की दोंनो भौंहों के बीच कुछ अतिरिक्त संवेदनशीलता होती है। इसे परीक्षा करके जाना जा सकता है।


यदि हम आँखे बंद करके बैठ जाएँ और कोई व्यक्ति हमारे भ्रू-मध्य के एकदम निकट ललाट की ओर तर्जनी उँगली ले जाए । तो वहाँ हमें कुछ विचित्र अनुभव होगा । यही तृतीय नेत्र की प्रतीति है। इस संवेदना को हम अपनी ऊँगली भृकुटि-मध्य लाकर भी अनुभव कर सकता है। इसलिए इस केन्द्र पर जब तिलक अथवा टीका लगाया जाता है, तो उससे आज्ञाचक्र को नियमित रुप से उत्तेजना मिलती रहती है। इससे सजग रुप में हम भले ही उससे जागरण के प्रति अनभिज्ञ रहें, पर अनावरण का वह क्रम हनवरत चलता रहता है। तिलक का तत्वदर्शन अपने आप में अनेंको प्रेरणाएँ सँजोएं हुए है।

                   तिलक या त्रिपुंड प्रायः चंदन का होता है। चंदन की प्रकृति शीतल होती है। शीतल चंदन जब मस्तक पर लगाया जाता है, तो उसके पीछे भाव यह होता है कि चिंतन का जो केंद्रिय संस्थान मस्तिष्क के रुप में खोपड़ी के अंदर विराजमान है, वह हमेशा शीतल बना रहे, उसके विचार और भाव इतने श्रेष्ठ हों जि अपनी तरह औंरो को भी शीतलता, शांति और प्रसन्नता प्रदान करता रहे। तिलक का महत्व जनजीवन में इतना अधिक है कि जब कोई महत्वपूर्ण, सम्मानसूचक, प्रसन्नदायक घतना घटती है, तो माथे पर तिलक लगा दिया जाता है। विवाह हो रहा हो तो तिलक, कोई युद्ध पर जा रहा हो तो तिलक हो। कोई युद्ध से विजयी होकर लौट रहा हो तो तिलक हो अर्थात् कोई भी सुखमय घटना हो, उसके साथ तिलक का अविच्छिन संबंध जोड़ दिया जाता है। ऐसा इसलिए कि वह आमनद चिरस्मरणीय बना रहे।


विवाहित स्त्रियाँ माँग में सिंदूर और माथे पर बिंदी लगाती है।   











बिंदी टीके का रुप है, वैसे ही माँग का सिंदूर तिलक का प्रतिक है। किंतु यहाँ इन्हे परिणीता के सुहाग के साथ जोड़ा दिया गया है। यह अक्षत सुहाग के चिन्ह हैं। इनमें समर्पण और निष्ठा का भाव पूर्णरुपेण पति की ओर है। वह उसकी समर्पिता है। अब उसके नारित्व पर कोई बाधा नहीं पड़ेगी, इसलिए पत्नी को पति के जीवन रहने तक इन्हे धारण करना पड़ता है। तिलक द्रव्य के रुप में भीन्न-भीन्न प्रकार की वस्तो्ओं का प्रयोग किया जाता है। श्वेत और रक्त चंदन भक्ति के प्रतिक हैं। इनका इस्तेमाल भजनानंदी किस्म के लोग करते है। केशर एवं गोरोचन ज्ञान तथा वैराज्ञ्य के प्रतिक है। ज्ञानी तत्वचिंतक और विरक्त ह्रदय वाले लोग इसका प्रयोग करते है। कस्तूरी ज्ञान, वैराज्ञ्य, भक्ति, प्रेम, सौंदर्य, ऐश्वर्य सभी का प्रतीक है, ।


      
         Suhag ki Raksha ke liye mantra - http://www.youtube.com/watch?v=XQWOUI0S92M 


मार्कण्डेय पुराण के ‘स्त्रिय समस्ता सकला जगत्सु’ के अनुसार नारी समाज शक्ति रूपा है। नारी समाज के सौभाग्य में लाल वर्ण की प्रधानता का यही कारण और मस्तक पर लाल वर्ण के रूप में हम मातृशक्ति धारण करने की कामना करते हैं।

यही कारण है कि ज्यादातर सांस्कृतिक तिलक महिलाएं ही पुरूषों के भाल पर करती है। चाहे वह बहिन, पत्नी या माँ किसी भी रूप में हो।

मानस की पंक्तियाँ : चित्रकूट के घाट पर भई संतन की भीड़ , तुलसीदास चंदन घिसें ,तिलक देत रघुबीर . तिलक परम्परा का अनुमोदन करतीं हैं .आज भी फौजी जब शत्रु से मोर्चे के लिए घर से विदा लेता है, तो माँ बहिन पत्नी उसको तिलक लगातीं हैं ,यात्रा पर जाने से पूर्व तिलक लगाने को शुभ माना जाता है ।

इस प्रकार तिलक या टीका एक धार्मिक प्रतीत होते हुए भी उसमें विज्ञान और दर्शन का साथ-साथ समावेश है। इनको समझ सकें और उनकी शिक्षाओं को आत्त्मसात् कर सकें तो ही उसकी सार्थकता है।


 

 







                                      सनातन धर्म की जय.......







 नमस्कार (प्रणाम) –दिव्य जीवन का प्रवेशव्दार

हे विद्यार्थी! नमस्कार भारतीय संस्कृति का अनमोल रत्न है। ऩमस्कार अर्थात् नमन, वंदन या प्रणाम। भारतीय संस्कृति में नमस्कार का अपना एक अलग ही स्थान और महत्व है। जिस प्रकार पश्चिम की संस्कृति में शेकहैन्ड किया जाता है, वैसे भारतीय संस्कृति में दो हाथ जोडकर, सिर झुकाकर प्रणाम करने का प्राचीन रिवाज है। नमस्कार के अलग-अलग भाव और अर्थ है।





नमस्कार एक श्रेष्ठ संस्कार है। जब तुम किसी बुजुर्ग, माता-पिता, संत-ज्ञानी-महापुरुष के समक्ष हाथ जोडकर मस्तक झुकाते हो, तब तुम्हारा अहंकार पिघलता है और अंतःकरण निर्मल होता है। तुम्हारा आडंबर मिट जाता है और तुम सरल  व सात्विक हो जाते हो। साथ-ही-साथ नमस्कार व्दारा योग-मुद्रा भी हो जाती है।



तुम दोनों हाथ जोडकर उँगलियों पर ललाट को लगाते हो। आँखें अर्धोन्मिलित रहती हैं, दोनों हाथ जुडे रहते हैं और हृदय पर रहते हैं। यह मुद्रा तुम्हारे विचारों पर संयम, वृतियों पर अंकुश तथा अभिमान पर नियंत्रण लाती है। तुम अपने व्यक्तित्व और अस्तित्व को विश्वास के आश्रय पर छोड देते हो और विश्वास पाते भी हो। नमस्कार की मुद्रा के व्दारा एकाकारता व तदाकारता का अनुभव होता है। सब व्दंव्द मिट जाते हैं।







विनयी पुरुष सभीको प्रिय होता है। वंदन तो चंदन के समान शीतल होता है। वंदन व्दारा दोनों व्यक्ति को शांति, सुख और संतोष प्राप्त होता है। वायु से भी पतले तथा हलके होने पर ही श्रेष्ठता के सम्मुख पहँचा जा सकता है और यह अनुभव मानों, नमस्कार की मुद्रा व्दारा सिध्द होता है।
जब नमस्कार व्दारा अपना अहं किसी योग्य के सामने झुक जाता है, तब शरणागति व समर्पण-भाव भी प्रकछ होता है।

सभी धर्मों में नमस्कार को स्वीकार किया गया है। ख्रिस्ती लोग छाती पर हाथ रखकर शीश झुकाते हैं। जैन धर्म में भी मस्तक नवाकर वंदना की जाती है परन्तु अपने वैदिक धर्म की नमस्कार करने की यह पध्दति अति उत्तम है। दोनों हाथों को जोडने से एक संकुल बनता है, जिससे जीवनशक्ति और तेजोवलय का क्षय रोकनेवाला एक चक्र बन जाता है। इस प्रकार का प्रणाम विशेष लाभकारी है जबकि एक-दूसरे से परस्पर हाथ मिलाने में जीवनशक्ति का ह्रास होता है तथा एक के संक्रमित रोगी होने की दशा में दूसरे को भी उस रोग का संक्रमण हो सकता है।
झुककर या हाथ मिलाकर अथवा गले लगकर किसी का अभिवादन करने से आपसी संबंध तो प्रगाढ़ हो सकते हैं। व्यक्ति के सभ्य सुसंस्कृत होने की छवि भी बनती है लेकिन झुककर अभिवादन करने का अलग ही महत्व है। जर्मन मूल की कृष्णभक्त साध्वी के मुताबिक भी हैलो हाय कहने से आधुनिक होने का कितना ही गर्व महसूस होता हो लेकिन प्रणाम में जैसी आश्वस्तता प्रतीत होती है, वह अद्भुत अलौकिक है।

लगता है कि भीतर ऊर्जा का उफान उठ रहा है, जो भाव, बोध और मस्तिष्क में रहने वाले बुद्धि का अतिक्रमण करते हुए ऊपर ही ऊपर फैलता जा रहा है। प्रभुपाद भक्तिवेदांत से सीधे हरेकृष्ण मंत्र की दीक्षा प्राप्त साध्वी का कहना है कि सामान्य प्रणाम अपनी तुलना में बेहतर स्थिति वालों के प्रति किया जाना चाहिए। किसी को नमस्कार करते हुए हम घोषणा करते हैं कि सभी के हृदय में एक ही दैवीय चेतना और प्रकाश है जो अनाहत चक्र (हृदय चक्र) में स्थित है।
बंगलूर में योग पर काम कर रही संस्था ब्रह्मविद्या फाउंडेशन के स्वामी वीके कृष्णन का कहना है कि प्रणाम के लिए जब हम गुरुजनों के चरणों में झुकते हैं तो उनकी प्राण ऊर्जा से जुड़ जाते हैं और वह ऊर्जा प्रणाम करने वाले की चेतना को भी ऊपर उठाती है। अगर निम्न स्तर के लोगों को प्रणाम किया जाए तो उससे हानि की संभावना ही ज्यादा रहती है। क्योंकि उस स्थिति में प्राण प्रवाह उलटी दिशा में बहने लगता है।

योग आचार्य केशव देव के अनुसार नमस्ते करने के लिए, दोनो हाथों को अनाहत चक पर रखा जाता है, आँखें बंद की जाती हैं, और सिर को झुकाया जाता है। इस विधि का विस्तार करते हुए हाथों को स्वाधिष्ठान चक्र (भौहों के बीच का चक्र) पर रखकर सिर झुकाकर और हाथों को हृदय के पास लाकर भी नमस्ते किया जा सकता है।

यह विधि गहरे आदर का सूचक है। जरूरी नहीं कि नमस्ते, नमस्कार या प्रणाम करते हुए ये शब्द बोले भी जाएं। नमस्कार या प्रणाम की भावमुद्रा का अर्थ ही उस भाव की अभिव्यक्ति है। 

प्रणाम करने की परंपरा दुनिया के हर कोने में है, लेकिन यह भारतीय संस्कृति का आधार है। शास्त्रों में जितने भी मन्त्रों का उल्लेख किया गया है, अधिकांश में नम: शब्द अवश्य आया है। यह नम: शब्द ही नमस्कार अथवा प्रणाम का सूचक है। जिस देवता का मन्त्र होता है, उसमें उसी देव को प्रणाम किया जाता है। ऐसी मान्यता है कि जब हम किसी को प्रणाम करते हैं, तो हम अवश्य ही आशीर्वाद प्राप्त करते हैं और पुण्य अर्जित करते हैं। मनु ने तो प्रणाम करने के कई लाभ गिनाए हैं।
अभिवादनशीलस्य नित्यं वृद्धोपि सेविन:, तस्य चत्वारि वर्धन्ते, आयु: विद्या यशो बलं।
अर्थात-प्रणाम करने वाले और बुजुर्गों की सेवा करने वाले व्यक्ति की आयु, विद्या, यश और बल चार चीजें अपने आप बढ़ जाती हैं। यह समाज की विडंबना ही है कि बहुत से लोग प्रणाम करने की बात तो दूर, प्रणाम का जवाब देने से भी कतराते हैं। इस बात को एक शेर में बहुत ही अच्छे ढंग से कहा गया है।
कोई हाथ भी न मिलाएगा जो गले मिलोगे तपाक से, यह नए मिजाज का शहर है, जरा फासले से मिला करो। हालांकि प्रणाम को एक मर्यादा में बांधा गया है कि लोग अपने से श्रेष्ठ को अवश्य प्रणाम करें, लेकिन देखने में आता है कि प्रणाम भी स्वार्थ के मकड़जाल में उलझ कर रह गया है। जिसका समय अच्छा होता है, उसे प्रणाम करने वालों की कतार लग जाती है और समाज में ऐसे लोगों की कमी नहीं है, जो श्रेष्ठ तो हैं, लेकिन यदि उनसे स्वार्थ न सधता हो, तो उन्हें प्रणाम कम ही लोग करते हैं। इस सन्दर्भ में गोस्वामी तुलसीदास ने तो गजब का आदर्श प्रस्तुत किया है।
सीय राममय सब जग जानी, करउं प्रनाम जोरि जुग पानी।
बन्दउं सन्त असज्जन चरना, दुखप्रद उभय बीच कछु बरना।
मतलब यह कि वह सभी को प्रणाम करने का सन्देश देते हैं। उनके अनुसार सम्पूर्ण संसार में भगवान व्याप्त है, इसलिए सभी को प्रणाम किया जाना चाहिए। उन्होंने तो सन्त और असज्जन सभी की वन्दना की है। यही नहीं, श्रीरामचरित मानस में तो दुश्मन को भी प्रणाम करने का उदाहरण है। हनुमान जी को सुरसा निगल जाना चाहती है, फिर भी हनुमान जी ने उसे प्रणाम किया। चौपाई है-
बदन पैठि पुनि बाहर आवा, मांगी बिदा ताहि सिर नावा। एक बात और, किसी को प्रणाम न करने से अनजाने में ही सही, उसका अपमान हो जाता है। शकुन्तला ने दुर्बासा ऋषि को प्रणाम नहीं किया, तो उन्होंने क्रोधित हो कर शकुन्तला को श्राप दे डाला।
दरअसल, प्रणाम कोई साधारण आचार या व्यवहार नहीं है। इसमें बहुत बड़ा विज्ञान छिपा है। साधारण तौर पर उसका अर्थ है, हृदय से प्रस्तुत हूं। प्रणाम करने में प्राय: भगवान के नाम का उच्चारण किया जाता है, जिसका अलग ही पुण्य होता है। बहुत से मामलों में तो प्रणाम भी बाहरी तौर पर किया जाता है और हृदय को उससे दूर ही रखा जाता है। शायद इसी सन्दर्भ में कहावत प्रचलित हुई-मुख पर राम बगल में छूरी। इस तरह का प्रणाम करने से अच्छा है न ही किया जाए। प्रणाम एक ऐसी व्यवस्था है, जो समाज को प्रेम के सूत्र में बांध कर रखती है। इसके महत्व को समझा जाए, तो समाज से कटुता अवश्य दूर होगी। ऐसी मान्यता है कि यदि आप किसी साधक को प्रणाम करते हैं, तो उसकी साधना का फल आपको बिना कोई साधना किए मिल जाता है। प्रणाम करने से अहंकार भी तिरोहित होता है। अहंकार के तिरोहित होने से परमार्थ की दिशा में कदम आगे बढ़ता है। प्रणाम को निष्काम कर्म के रूप में लिया जाना चाहिए। वेदों में ईश्वर को प्रणाम करने की व्यवस्था है, जिसे प्रार्थना कहा गया है। यह कोई याचना नहीं, निष्काम कर्म ही है, जो परमार्थ के लिए प्रमुख साधन है। श्रीरामचरित मानस में कहा गया है, हरि व्यापक सर्वत्र समाना, प्रेम ते प्रकट होइ मैं जाना। ईश्वर कण-कण में व्याप्त है, जो प्रेम के वशीभूत हो कर प्रकट हो जाता है। इसलिए चेतन ही नहीं, जड़ वस्तुओं को भी प्रणाम किया जाए, तो वह ईश्वर को ही प्रणाम है, क्योंकि कोई ऐसी जगह नहीं है, जहां ईश्वर नहीं है।
एक बात और, प्रणाम सद्भाव से ही किया जाना चाहिए, भले ही वह मानसिक क्यों न हो। शास्त्रों में इसके भी उदाहरण मिलते हैं। श्रीरामचरित मानस का सन्दर्भ लें, तो स्वयंबर के मौके पर श्रीराम ने अपने गुरु को मन में ही प्रणाम किया था।
गुरहि प्रनामु मनहि मन कीन्हा, अति लाघव उठाइ धनु लीन्हा।
अर्थात-उन्होंने मन-ही-मन गुरु को प्रणाम किया और बड़ी फुर्ती से धनुश उठा लिया। इस प्रकार प्रणाम के रहस्य को समझ कर उसे जीवन में लागू किया जाए, तो अनेक रहस्यपूर्ण अनुभव होंगे, इसमें कोई सन्देह नहीं।




No comments:

Post a Comment