सिंध के नवाब जिल्ले के
बेराणी गाँव में नगरसेठ श्री थाउमल सिरुमलानी के श्रीमंत और पवित्र परिवार में
वि.सं. 1998 में चैत वद 6 के दिन एक अलौकिक बालक का प्रागट्य हुआ। बालक का नाम रखा
गया आसुमल। उनके जन्म के साथ ही परिवार में कई चमत्कारपूर्ण घटनायें घटने लगीं।
कोई एक बडा सौदागर किसी अगम्य प्रेरणा से वहाँ आया और एक बहुत कीमती झूला नगरसेठ
को भेंट दे गया। साडे तीन साल की उम्र में ही इस प्रज्ञावान मेधावी बालक ने स्कूल
में सिर्फ एक बार कविता सुनकर कण्ठस्थ करके विद्यार्थियों को एवं अध्यापकों को
आश्चर्यचकित कर दिये। कुलगुरु ने भविष्यकथन किया कि यह बालक आगे जाकर एक महान संत
बनेगा और लोगों का उध्दार करेगा।
कुदरत ने करवट ली। सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन में सेठ थाउमल अपनी सारी धन-सम्पत्ति,
जमीन-जागीर, पशुधन, मानो अपना एक रजवाडा पाकिस्तान में छोडकर भारत, अहमदाबाद आकर बसे।
बालक आसुमल के अभ्यास की
व्यवस्था एक स्कूल में कर दी गई। लेकिन ब्रह्मविद्या के राही इस बालक को लौकिक
वद्या पढने में रुचि नहीं हुई। वे किसी पेड के नीचे एकांत में जाकर ध्यानमग्न हो
जाते। प्रसन्नता और अन्य अलौकिक गुणों के कारण वे स्कूल के अध्यापकों में प्रिय
विद्यार्थी बन गये।
आसुमल की छोटी उम्र में ही
पिता की देह शांत हो गई। बालक आसुमल को परिवार के पोषणार्थ बडे भाई के साथ
व्यापार-धंधे में सम्मिलित होना पडा। अपनी कुशाग्र बुध्दि एवं साधना के प्रभाव से
उन्होंने बडे भाई को व्यापार में आर्थिक लाभ कराये। लेकिन खुद को केवल आध्यात्मिक
धन का अर्जन करने की लगन रही।
पिता के
निधन के बाद आसुमल की विवेकसंपन्न बुध्दि ने संसार की
असारता और परमात्मा ही एक मात्र परम सार है यह बात जान ली थी। लेकिन अगम के ये
प्रवासी वहीं अटकने वाले नहीं थे। वैराग्य की अग्नि उनके अंतरतम में प्रकट हो चुकी
थी।
कुछ बडे होते ही घरवालों ने आसुमल की शादी करने की तैयारी की। आसुमल
सचेत हो गये। घर छोडकर पलायन हो गये लेकिन घरवालों ने उन्हें खोज लिया। तीव्रतर
प्रारब्ध के कारण शादी हो गई आसुमल वह सुवर्ण-बन्धन में रुके नहीं। सुशील पवित्र
धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को समझाकर अपने परम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति, आत्म-साक्षात्कार
के लिए घर छोडकर चले गये।
जंगलों में, पहाडों में, गुफाओं में एवं अनेक
तीर्थों में घूमे, कंटक पत्थरवाले मार्गों से चले, शीलाओं की शैय्या में सोये, मौत
का मुकाबला करना पडे ऐसे स्थानों में जाकर उग्र कठोर साधनायें की।
इन सब तितिक्षाओं के बाद
नैनिताल के जंगल में उन्हें ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुदेव प.पू. स्वामी श्री लीलाशाहजी
महाराज के श्रीचरणों का सांनिध्य प्राप्त हुआ। वहाँ भी कठोर कसौटियाँ हुई।
परमात्मा के प्यार में तडपता हुआ वह परमवीर सब कसौटियाँ पार करके सद्गुरुदेव का
कृपा-प्रसाद पाने का अधिकारी बन गया।
गुरुदेव ने आसुमल को घर में
ही ध्यान भजन करने का आदेश देकर अहमदाबाद वापस भेज दिये। घर तो आये लेकिन जिस
सच्चे साधक का आखिरी लक्ष्य सिध्द न हुआ हो उसको चैन कहाँ ?
चातक मीन पतंग जब
पिय बिन नहीं रह पाय।
साध्य को पाये बिना साधक क्यों रह जाय ?
वे घर छोडकर नर्मदा किनारे जाकर अनुष्ठान में संलग्न हो गये।
एक बार नदी के किनारे ध्यानसथ बैठे थे। मध्यरात्रि के वक्त तूफान-आंधी
चली। वे उठकर किसी एक मकान के बरामदे में जाकर बैठ गये और जगत को भूलकर उसी प्यारे
परमात्मा के ध्यान में फिर से डूब गयें।
रात बीती जा रही थी। कोई एक माछीमार लघुशंका करने बाहार निकला और इनको
यहाँ बैठे हुए देखकर चौंका। इन्हें चोर डाकू समझकर पूरे मुहल्ले को जगाया। भीड
इकट्ठी हो गई। उन पर हमला करने के लिए लोग लाठी, भाला, चाकू-छरी, धारीया लेकर खडे
हो गये। लेकिन...
जा को रखे सांईयाँ मार
सके ना कोई।
बाल न बाका करिसके चाहे जग
वैरि होई।।
हाथ में हथियार होने पर भी वे माछीमार लोग आसुमल के नजदीक न आ सके,
क्योंकि जिनके पास आत्मशांति का हथियार होता है उनको लाठी, भाला, चाकू, छरीवाले माछीमार
क्या कर सकते हैं ? उस विलक्षण प्रसंग का वास्तविक वर्णन करना यहाँ असंभव है।
ईश्वर की शांति में डूबने
से जन्म-मरण का चक्कर रुक जाता है तो माछीमारों के हथियार रुक जाय और मन बदल जाय
इसमें क्या आश्चर्य है?
शोरगुल सुनकर आसुमल का
ध्यान टूटा। परिस्थिति का खयाल आया। आत्ममस्ती में मस्त, स्वस्थ शांतचित होकर वे
खडे हुए। हमला करने के लिए तत्पर लोगों पर एक प्रेमपूर्ण दृष्टि डालते हुए धीर
गंभीर निश्चल कदम उठाते हुए आसुमल भीड को चीरकर बाहर निकल गये। बाद में लोगों को
पता चला तो माफी माँगी और अत्यंत आदर करने लगे।
फिर वे गणेशपुरी में अपने
एकान्तस्थान में पधारे हुए सद्गुरुदेव प.पू. लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों में
पुनः पहुँच गये।
साधना की इतनी तीव्र
लगनवाले अपने प्यारे शिष्य को देखकर सद्गुरुदेव का करुणापूर्ण हृदय छलक उठा। उनके
हृदय से बरसते कृपा-अमृत ने साधक की तमाम साधनायें पूर्ण कर दी। पूर्ण गुरु ने
शिष्य को पूर्ण गुरुत्व में सुप्रतिष्ठित कर दिया। साधक में सिध्द प्रकट हो गया। जीव
को अपने शिवत्व की पहचान हो गई। उस परम पावन दिन आत्म-साक्षात्कार हो गया। आसुमल
में से संत श्री आसाराम महाराज का आविर्भाव हो गया।
उसके बाद कुछ
वर्ष डीसा में ब्रह्मानन्द की मस्ती लूटते हुए एकान्त में रहे।
उसके बाद कुछ वर्ष डीसा
में ब्रह्मानन्द की मस्ती लूटते हुए एकान्त में रहे। फिर अहमदाबाद में मोटेरा गाँव
के पास साबरमती नदी के किनारे भक्तों ने एक कच्ची कुटिया बना दी। वहाँ से उन पूर्ण
विकसित सुमधुर आध्यात्मिक पुष्प की मधुर सुवास चारों दिशा में फैलने लगी। दिन को
भी जहाँ चोरी और खून की घटनायें हो जाय ऐसी डरावनी उबडखाबड भूमि में स्थित वह
कुटिया आज एक महान तीर्थधाम बन चुकी है। उसका नाम है सन्त श्री आसारामजी आश्रम।
इस
ज्ञान की प्याउ में आकर समाज के सुप्रतिष्ठित श्रीमंत लोगों से लेकर सामान्य
आमजनता ध्यान और सत्संग का अमृत पीते हैं और अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ सुलझाकर
धन्य होते हैं और अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ सुलाझाकर धन्य होते हैं। यहाँ पर वर्ष भर में चार पाँच
बडी ध्यान योग शिविरें लगती हैं जिसमें रहकर असंख्य लोग ध्यानामृत पीकर ईश्वरीय
आनन्द लूटते हैं। हर रविवार और बुधवार के दिन भी ऐसी ही एक ’मीनी शिविर ’ हो जाती है।
श्री सद्गुरु चरण कमलेभो नमः
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