HINDU
The culture that has no begining nor End...that tooks us towards salvation
Tuesday, December 10, 2013
Monday, December 9, 2013
राजा युधिष्ठिर अक्रोध और क्षमा के मूर्तिमान स्वरुप थे।
महाभारत के वन पर्व में कथा आती है कि द्रौपदी ने एक बार युधिष्ठिरजी के मन में
क्रोध का संचार करने के लिए अतिशय चेष्टा की। उसने कहा : “नाथ! मैं राजा द्रुपद की कन्या हूँ, पांडवों की कन्या हूँ, पांडवों की धर्मपत्नी और धृष्टद्युम्न की बहन
हूँ। मुझको जंगलों में मारी-मारी फिरती देखकर तथा अपने
छोटे भाइयों को वनवास के घोर दुःख से व्याकुल देख के भी यदि आपको कौरवों पर क्रोध
नहीं आता तो इससे मालूम होता है कि आपमें जरा भी क्रोध नहीं है। परंतु देव! जिस मनुष्य में क्रोध का अभाव है, जो क्रोध के पात्र पर भी क्रोध नहीं करता, वह तो क्षत्रिय कहलीने योग्य ही नहीं है।
जो उपकारी हो, जिसने भूल या मूर्खता से कोई अपराध कर दिया हो अथवा अपराध करके जो
क्षमाप्रार्थी हो गया हो, उसको क्षमा करना तो
क्षत्रिय का परम धर्म है, परंतु जो जानबूझकर बार-बार अपराध करता हो, उसको भी क्षमा करते रहना क्षत्रिय का धर्म नहीं
है। अतः स्वामी! जानबूझकर नित्य ही अनेक अपराध करनेवाले ये कौरव
क्षमा के पात्र नहीं बल्कि क्रोध के पात्र हैं। इन्हें समुचित दंड मिलना ही चाहिए।’’
राजा युधिष्ठिर ने उत्तर दिया : “ परम बुध्दिमती द्रौपदी! क्रोध ही मनुष्यों को मारनेवाला है और यदि क्रोध
को जीत लिया जाय तो यह अभ्युदय करनेवाला है। उन्नति और अवनति दोनों का मूल क्रोध
ही है।
अतः हे द्रौपदी! धीर पुरुषों व्दारा त्यागे
हुए क्रोध को मैं अपने हृदय में कैसे स्थान दे सकता हूँ! क्रोध के वशीभूत हुआ मनुष्य तो सभी पापों को कर सकता है। श्रेष्ठ पुरुषों का
अपमान भी कर देता है।
क्रोधी
पुरुष को अपने कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान बिल्कुल
नहीं रहता, वह जो चाहे सो अनर्थ बात-ही-बात में कर डालता है। उसे बोलने योग्य और न बोलने योग्य का भी ध्यान नहीं रहता, वह जो मन में आता है वही बोलने लगता है। अतः
तुम्हीं बतलाओ, महा अनर्थों के मूल क्रोध
को मैं कैसे आश्रय दे सकता हूँ ?
आत्मानं च परांश्चैव
त्रायते महतो भयात् ।
क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन्
व्दयोरेष चिकित्सकः ।।
‘क्रोध करनेवाले पुरुष के प्रति जो बदले में क्रोध नहीं करता, वह अपने को और दूसरों को भी महान भय से बचा लेता
है। वह अपने और परायें दोनों के दोषों को दूर करने के लिए चिकित्सक बन जाता है।’ (महाभारत, वन पर्व, 29.9)
द्रौपदी! मुर्ख लोग क्रोध को ही सदा तेज मानते हैं परंतु रजोगुणजनित
क्रोध का यदि मनुष्यों के प्रति प्रयोग हो तो वह लोगों के नाश का कारण होता है। इस
जगत में पृथ्वी के समान क्षमाशील पुरुष भी देखे जाते है।
सुशोभने! पुरुष को सभी आपत्तियों
में क्षमाभाव रखना चाहिए। क्षमावान महात्मा काश्वपजी ने इस (क्षमा) गाथा का गान किया है –
क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः
क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम् ।
य एतदेवं जानाति
स सर्वं क्षन्तुमर्हति ।।
‘क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है। जो इस प्रकार
जानता है, वह सब कुछ क्षमा करने के योग्य हो जाता है।’ (महाभारत, वन पर्व, 29.36)
क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं
क्षमा भूतं च भवि च ।
क्षमा तपः क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं
जगत् ।।
‘क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत है, क्षमा भविष्य है, क्षमा तप है और क्षमा शौच
है। क्षमा ने ही इस सम्पर्ण जगत को धारण कर रखा है।’ (महाभारत, वन पर्व, 29.37)
क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम् ।
क्षमा सत्यं सत्यवतां
क्षमा यज्ञः क्षमा शमः ।।
क्षमा तेजस्वी पुरुषों का तेज है, क्षमा तपस्वियों का ब्रह्म है, क्षमा सत्यवादी पुरुषों का सत्य है, क्षमा यज्ञ है और क्षमा शम (मनोनिग्रह) है। (महाभारत, वन पर्व, 29.4)
कृष्णे जिसका महत्त्व ऐसा बताया
गया है, जिसमें ब्रह्म, सत्य यज्ञ और लोक सभी प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमा को मेरे जैसा मनुष्य कैसे छोड सकता है, अतः मैं यथार्थ रुप से क्षमा को ही अपनाऊँगा।
धर्मराज युधिष्ठिर जैसे अक्रोध के
उपासकों का आचार-व्यवहार उन्नति के इच्छुक
व्यक्तियों के लिए बहुत ही उपयोगी है। महर्षि दुर्वासा, ब्रह्मर्षि विश्वामित्रजी, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुष आवश्यकता
पडने पर क्रोध को वश में रखते हुए उसका आवाहन और विसर्जन करते है। रमण महर्षि के
आगे तर्क-कुतर्क करके अपनी विव्दता दिखानेवाला एक पंडित
पर वे ऐसे तो बरस पडे कि डंडा उठाकर दूर तक उसका पीछा किया। वापस आये तो उनके चेहरे
पर वही परम शांति झलक रही थी। घमंडियों, दुर्जनों से पिंड छुडाने के लिए ऐसी फुफकार लगाना क्रोध नहीं कहा जाता, अतः यह वर्जित नहीं है।
माँ बालक की और सद्गुरु शिष्य की
नासमझी पर कई बार क्रोध करते दिखते हैं परंतु उससे उनके हृदय में जलन नहीं पैदा
होती, अतः यह डाँटना-फटकारना भी शास्त्र-निंदित क्रोध नहीं है। इस प्रकार हृदय को बेचैन किये बिना शुध्द हितभावना से
फुफकार या डाँट लगाना भारतीय संस्कृति में वर्जित नहीं है, क्योंकि इसमें हित की प्रधानता है।
भारतीय संस्कृति का क्या दिव्य ज्ञान
है, क्या सुंदर उपदेश है! कितने उच्च भाव हैं! तेज, क्षमा, समता, विवेक, शांति तथा हित की व्यवस्था
का कितना सुंदर सम्मिश्रण है अपनी संस्कृति में ! प्रत्येक मनुष्य इस ज्ञान
को जीवन में लाकर दुःख, शोक, अशांति, बेचैनी से परे सुख, शांति एवं आनंदमय जीवन जी
सकता है। बालक कितना आनंदित रहता है। आनंदमय
जीवन मनुष्य का जन्मसिध्द अधिकार है। अहंकार और श्रमरहित आत्मविश्राम की
सहज-सुलभ नजरिया हटा तब से मनुष्य दुःखी हुआ। अतः वह
नजरिया अपनाओ। अहंकार और श्रमरहित आत्म-विश्राम।
-पुज्य बापुजीSaturday, December 7, 2013
सिंध के नवाब जिल्ले के
बेराणी गाँव में नगरसेठ श्री थाउमल सिरुमलानी के श्रीमंत और पवित्र परिवार में
वि.सं. 1998 में चैत वद 6 के दिन एक अलौकिक बालक का प्रागट्य हुआ। बालक का नाम रखा
गया आसुमल। उनके जन्म के साथ ही परिवार में कई चमत्कारपूर्ण घटनायें घटने लगीं।
कोई एक बडा सौदागर किसी अगम्य प्रेरणा से वहाँ आया और एक बहुत कीमती झूला नगरसेठ
को भेंट दे गया। साडे तीन साल की उम्र में ही इस प्रज्ञावान मेधावी बालक ने स्कूल
में सिर्फ एक बार कविता सुनकर कण्ठस्थ करके विद्यार्थियों को एवं अध्यापकों को
आश्चर्यचकित कर दिये। कुलगुरु ने भविष्यकथन किया कि यह बालक आगे जाकर एक महान संत
बनेगा और लोगों का उध्दार करेगा।
कुदरत ने करवट ली। सन् 1947 में भारत-पाकिस्तान के विभाजन में सेठ थाउमल अपनी सारी धन-सम्पत्ति,
जमीन-जागीर, पशुधन, मानो अपना एक रजवाडा पाकिस्तान में छोडकर भारत, अहमदाबाद आकर बसे।
बालक आसुमल के अभ्यास की
व्यवस्था एक स्कूल में कर दी गई। लेकिन ब्रह्मविद्या के राही इस बालक को लौकिक
वद्या पढने में रुचि नहीं हुई। वे किसी पेड के नीचे एकांत में जाकर ध्यानमग्न हो
जाते। प्रसन्नता और अन्य अलौकिक गुणों के कारण वे स्कूल के अध्यापकों में प्रिय
विद्यार्थी बन गये।
आसुमल की छोटी उम्र में ही
पिता की देह शांत हो गई। बालक आसुमल को परिवार के पोषणार्थ बडे भाई के साथ
व्यापार-धंधे में सम्मिलित होना पडा। अपनी कुशाग्र बुध्दि एवं साधना के प्रभाव से
उन्होंने बडे भाई को व्यापार में आर्थिक लाभ कराये। लेकिन खुद को केवल आध्यात्मिक
धन का अर्जन करने की लगन रही।
पिता के
निधन के बाद आसुमल की विवेकसंपन्न बुध्दि ने संसार की
असारता और परमात्मा ही एक मात्र परम सार है यह बात जान ली थी। लेकिन अगम के ये
प्रवासी वहीं अटकने वाले नहीं थे। वैराग्य की अग्नि उनके अंतरतम में प्रकट हो चुकी
थी।
कुछ बडे होते ही घरवालों ने आसुमल की शादी करने की तैयारी की। आसुमल
सचेत हो गये। घर छोडकर पलायन हो गये लेकिन घरवालों ने उन्हें खोज लिया। तीव्रतर
प्रारब्ध के कारण शादी हो गई आसुमल वह सुवर्ण-बन्धन में रुके नहीं। सुशील पवित्र
धर्मपत्नी लक्ष्मीदेवी को समझाकर अपने परम लक्ष्य परमात्म-प्राप्ति, आत्म-साक्षात्कार
के लिए घर छोडकर चले गये।
जंगलों में, पहाडों में, गुफाओं में एवं अनेक
तीर्थों में घूमे, कंटक पत्थरवाले मार्गों से चले, शीलाओं की शैय्या में सोये, मौत
का मुकाबला करना पडे ऐसे स्थानों में जाकर उग्र कठोर साधनायें की।
इन सब तितिक्षाओं के बाद
नैनिताल के जंगल में उन्हें ब्रह्मनिष्ठ सद्गुरुदेव प.पू. स्वामी श्री लीलाशाहजी
महाराज के श्रीचरणों का सांनिध्य प्राप्त हुआ। वहाँ भी कठोर कसौटियाँ हुई।
परमात्मा के प्यार में तडपता हुआ वह परमवीर सब कसौटियाँ पार करके सद्गुरुदेव का
कृपा-प्रसाद पाने का अधिकारी बन गया।
गुरुदेव ने आसुमल को घर में
ही ध्यान भजन करने का आदेश देकर अहमदाबाद वापस भेज दिये। घर तो आये लेकिन जिस
सच्चे साधक का आखिरी लक्ष्य सिध्द न हुआ हो उसको चैन कहाँ ?
चातक मीन पतंग जब
पिय बिन नहीं रह पाय।
साध्य को पाये बिना साधक क्यों रह जाय ?
वे घर छोडकर नर्मदा किनारे जाकर अनुष्ठान में संलग्न हो गये।
एक बार नदी के किनारे ध्यानसथ बैठे थे। मध्यरात्रि के वक्त तूफान-आंधी
चली। वे उठकर किसी एक मकान के बरामदे में जाकर बैठ गये और जगत को भूलकर उसी प्यारे
परमात्मा के ध्यान में फिर से डूब गयें।
रात बीती जा रही थी। कोई एक माछीमार लघुशंका करने बाहार निकला और इनको
यहाँ बैठे हुए देखकर चौंका। इन्हें चोर डाकू समझकर पूरे मुहल्ले को जगाया। भीड
इकट्ठी हो गई। उन पर हमला करने के लिए लोग लाठी, भाला, चाकू-छरी, धारीया लेकर खडे
हो गये। लेकिन...
जा को रखे सांईयाँ मार
सके ना कोई।
बाल न बाका करिसके चाहे जग
वैरि होई।।
हाथ में हथियार होने पर भी वे माछीमार लोग आसुमल के नजदीक न आ सके,
क्योंकि जिनके पास आत्मशांति का हथियार होता है उनको लाठी, भाला, चाकू, छरीवाले माछीमार
क्या कर सकते हैं ? उस विलक्षण प्रसंग का वास्तविक वर्णन करना यहाँ असंभव है।
ईश्वर की शांति में डूबने
से जन्म-मरण का चक्कर रुक जाता है तो माछीमारों के हथियार रुक जाय और मन बदल जाय
इसमें क्या आश्चर्य है?
शोरगुल सुनकर आसुमल का
ध्यान टूटा। परिस्थिति का खयाल आया। आत्ममस्ती में मस्त, स्वस्थ शांतचित होकर वे
खडे हुए। हमला करने के लिए तत्पर लोगों पर एक प्रेमपूर्ण दृष्टि डालते हुए धीर
गंभीर निश्चल कदम उठाते हुए आसुमल भीड को चीरकर बाहर निकल गये। बाद में लोगों को
पता चला तो माफी माँगी और अत्यंत आदर करने लगे।
फिर वे गणेशपुरी में अपने
एकान्तस्थान में पधारे हुए सद्गुरुदेव प.पू. लीलाशाहजी महाराज के श्रीचरणों में
पुनः पहुँच गये।
साधना की इतनी तीव्र
लगनवाले अपने प्यारे शिष्य को देखकर सद्गुरुदेव का करुणापूर्ण हृदय छलक उठा। उनके
हृदय से बरसते कृपा-अमृत ने साधक की तमाम साधनायें पूर्ण कर दी। पूर्ण गुरु ने
शिष्य को पूर्ण गुरुत्व में सुप्रतिष्ठित कर दिया। साधक में सिध्द प्रकट हो गया। जीव
को अपने शिवत्व की पहचान हो गई। उस परम पावन दिन आत्म-साक्षात्कार हो गया। आसुमल
में से संत श्री आसाराम महाराज का आविर्भाव हो गया।
उसके बाद कुछ
वर्ष डीसा में ब्रह्मानन्द की मस्ती लूटते हुए एकान्त में रहे।
उसके बाद कुछ वर्ष डीसा
में ब्रह्मानन्द की मस्ती लूटते हुए एकान्त में रहे। फिर अहमदाबाद में मोटेरा गाँव
के पास साबरमती नदी के किनारे भक्तों ने एक कच्ची कुटिया बना दी। वहाँ से उन पूर्ण
विकसित सुमधुर आध्यात्मिक पुष्प की मधुर सुवास चारों दिशा में फैलने लगी। दिन को
भी जहाँ चोरी और खून की घटनायें हो जाय ऐसी डरावनी उबडखाबड भूमि में स्थित वह
कुटिया आज एक महान तीर्थधाम बन चुकी है। उसका नाम है सन्त श्री आसारामजी आश्रम।
इस
ज्ञान की प्याउ में आकर समाज के सुप्रतिष्ठित श्रीमंत लोगों से लेकर सामान्य
आमजनता ध्यान और सत्संग का अमृत पीते हैं और अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ सुलझाकर
धन्य होते हैं और अपने जीवन की दुःखद गुत्थियाँ सुलाझाकर धन्य होते हैं। यहाँ पर वर्ष भर में चार पाँच
बडी ध्यान योग शिविरें लगती हैं जिसमें रहकर असंख्य लोग ध्यानामृत पीकर ईश्वरीय
आनन्द लूटते हैं। हर रविवार और बुधवार के दिन भी ऐसी ही एक ’मीनी शिविर ’ हो जाती है।
श्री सद्गुरु चरण कमलेभो नमः
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