Monday, December 9, 2013



     राजा युधिष्ठिर अक्रोध और क्षमा के मूर्तिमान स्वरुप थे। महाभारत के वन पर्व में कथा आती है कि द्रौपदी ने एक बार युधिष्ठिरजी के मन में क्रोध का संचार करने के लिए अतिशय चेष्टा की। उसने कहा : “नाथ! मैं राजा द्रुपद की कन्या हूँ, पांडवों की कन्या हूँ, पांडवों की धर्मपत्नी और धृष्टद्युम्न की बहन हूँ। मुझको जंगलों में मारी-मारी फिरती देखकर तथा अपने छोटे भाइयों को वनवास के घोर दुःख से व्याकुल देख के भी यदि आपको कौरवों पर क्रोध नहीं आता तो इससे मालूम होता है कि आपमें जरा भी क्रोध नहीं है। परंतु देव! जिस मनुष्य में क्रोध का अभाव है, जो क्रोध के पात्र पर भी क्रोध नहीं करता, वह तो क्षत्रिय कहलीने योग्य ही नहीं है।

  जो उपकारी हो, जिसने भूल या मूर्खता से कोई अपराध कर दिया हो अथवा अपराध करके जो क्षमाप्रार्थी हो गया हो, उसको क्षमा करना तो क्षत्रिय का परम धर्म है, परंतु जो जानबूझकर बार-बार अपराध करता हो, उसको भी क्षमा करते रहना क्षत्रिय का धर्म नहीं है। अतः स्वामी! जानबूझकर नित्य ही अनेक अपराध करनेवाले ये कौरव क्षमा के पात्र नहीं बल्कि क्रोध के पात्र हैं। इन्हें समुचित दंड मिलना ही चाहिए।’’
     राजा युधिष्ठिर ने उत्तर दिया : “ परम बुध्दिमती द्रौपदी! क्रोध ही मनुष्यों को मारनेवाला है और यदि क्रोध को जीत लिया जाय तो यह अभ्युदय करनेवाला है। उन्नति और अवनति दोनों का मूल क्रोध ही है।

   अतः हे द्रौपदी! धीर पुरुषों व्दारा त्यागे हुए क्रोध को मैं अपने हृदय में कैसे स्थान दे सकता हूँ! क्रोध के वशीभूत हुआ मनुष्य तो सभी पापों को कर सकता है। श्रेष्ठ पुरुषों का अपमान भी कर देता है।

       क्रोधी पुरुष को अपने कर्तव्य-अकर्तव्य का ज्ञान बिल्कुल नहीं रहता, वह जो चाहे सो अनर्थ बात-ही-बात में कर डालता है। उसे बोलने योग्य और न बोलने योग्य का भी ध्यान नहीं रहता, वह जो मन में आता है वही बोलने लगता है। अतः तुम्हीं बतलाओ, महा अनर्थों के मूल क्रोध को मैं कैसे आश्रय दे सकता हूँ ?  
           आत्मानं च परांश्चैव त्रायते महतो भयात् ।
           क्रुध्यन्तमप्रतिक्रुध्यन् व्दयोरेष चिकित्सकः ।।
                ‘क्रोध करनेवाले पुरुष के प्रति जो बदले में क्रोध नहीं करता, वह अपने को और दूसरों को भी महान भय से बचा लेता है। वह अपने और परायें दोनों के दोषों को दूर करने के लिए चिकित्सक बन जाता है।’   (महाभारत, वन पर्व, 29.9)
          द्रौपदी! मुर्ख लोग क्रोध को ही सदा तेज मानते हैं परंतु रजोगुणजनित क्रोध का यदि मनुष्यों के प्रति प्रयोग हो तो वह लोगों के नाश का कारण होता है। इस जगत में पृथ्वी के समान क्षमाशील पुरुष भी देखे जाते है।
       सुशोभने! पुरुष को सभी आपत्तियों में क्षमाभाव रखना चाहिए। क्षमावान महात्मा काश्वपजी ने इस (क्षमा) गाथा का गान किया है –
                क्षमा धर्मः क्षमा यज्ञः क्षमा वेदाः क्षमा श्रुतम् ।
                     य एतदेवं जानाति स सर्वं क्षन्तुमर्हति ।।
  ‘क्षमा धर्म है, क्षमा यज्ञ है, क्षमा वेद है और क्षमा शास्त्र है। जो इस प्रकार जानता है, वह सब कुछ क्षमा करने के योग्य हो जाता है।’                        (महाभारत, वन पर्व, 29.36)
   
              क्षमा ब्रह्म क्षमा सत्यं क्षमा भूतं च भवि च ।  
                क्षमा तपः क्षमा शौचं क्षमयेदं धृतं जगत् ।।
   ‘क्षमा ब्रह्म है, क्षमा सत्य है, क्षमा भूत है, क्षमा भविष्य है, क्षमा तप है और क्षमा शौच है। क्षमा ने ही इस सम्पर्ण जगत को धारण कर रखा है।’       (महाभारत, वन पर्व, 29.37) 
  क्षमा तेजस्विनां तेजः क्षमा ब्रह्म तपस्विनाम् ।
                क्षमा सत्यं सत्यवतां क्षमा यज्ञः क्षमा शमः ।।
क्षमा तेजस्वी पुरुषों का तेज है, क्षमा तपस्वियों का ब्रह्म है, क्षमा सत्यवादी पुरुषों का सत्य है, क्षमा यज्ञ है और क्षमा शम (मनोनिग्रह) है।  (महाभारत, वन पर्व, 29.4)
      कृष्णे जिसका महत्त्व ऐसा बताया गया है, जिसमें ब्रह्म, सत्य यज्ञ और लोक सभी प्रतिष्ठित हैं, उस क्षमा को मेरे जैसा मनुष्य कैसे छोड सकता है, अतः मैं यथार्थ रुप से क्षमा को ही अपनाऊँगा।
     धर्मराज युधिष्ठिर जैसे अक्रोध के उपासकों का आचार-व्यवहार उन्नति के इच्छुक व्यक्तियों के लिए बहुत ही उपयोगी है। महर्षि दुर्वासा, ब्रह्मर्षि विश्वामित्रजी, रमण महर्षि जैसे जीवन्मुक्त महापुरुष आवश्यकता पडने पर क्रोध को वश में रखते हुए उसका आवाहन और विसर्जन करते है। रमण महर्षि के आगे तर्क-कुतर्क करके अपनी विव्दता दिखानेवाला एक पंडित पर वे ऐसे तो बरस पडे कि डंडा उठाकर दूर तक उसका पीछा किया। वापस आये तो उनके चेहरे पर वही परम शांति झलक रही थी। घमंडियों, दुर्जनों से पिंड छुडाने के लिए ऐसी फुफकार लगाना क्रोध नहीं कहा जाता, अतः यह वर्जित नहीं है।
 

     
        माँ बालक की और सद्गुरु शिष्य की नासमझी पर कई बार क्रोध करते दिखते हैं परंतु उससे उनके हृदय में जलन नहीं पैदा होती, अतः यह डाँटना-फटकारना भी शास्त्र-निंदित क्रोध नहीं है। इस प्रकार हृदय को बेचैन किये बिना शुध्द हितभावना से फुफकार या डाँट लगाना भारतीय संस्कृति में वर्जित नहीं है, क्योंकि इसमें हित की प्रधानता है।

 भारतीय संस्कृति का क्या दिव्य ज्ञान है, क्या सुंदर उपदेश है! कितने उच्च भाव हैं! तेज, क्षमा, समता, विवेक, शांति तथा हित की व्यवस्था का कितना सुंदर सम्मिश्रण है अपनी संस्कृति में ! प्रत्येक मनुष्य इस ज्ञान को जीवन में लाकर दुःख, शोक, अशांति, बेचैनी से परे सुख, शांति एवं आनंदमय जीवन जी सकता है। बालक कितना आनंदित रहता है। आनंदमय  जीवन मनुष्य का जन्मसिध्द अधिकार है। अहंकार और श्रमरहित आत्मविश्राम की सहज-सुलभ नजरिया हटा तब से मनुष्य दुःखी हुआ। अतः वह नजरिया अपनाओ। अहंकार और श्रमरहित आत्म-विश्राम।          
                       -पुज्य बापुजी

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